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  • August 26, 2026
  • Last Update August 24, 2026 8:46 PM
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Exclusive: जिस ईमानदारी के आगे हार गया था सियासी लालच, वही भुलई भाई बने UP PCS का सवाल, देखिए खास तस्वीरें

Exclusive: जिस ईमानदारी के आगे हार गया था सियासी लालच, वही भुलई भाई बने UP PCS का सवाल, देखिए खास तस्वीरें

नेशनल डेस्क : राजनीति में जब विश्वसनीयता, साध्यता और सिद्धांतों की चर्चा होती है तो जननेता श्री नारायण नारायण ‘भुलई भाई’ का नाम आज भी सम्मान के साथ लिया जाता है। कभी सरकारी नौकरी के लिए जनसेवा का टिकट खरीदने वाले भुलई भाई ने सार्वजनिक जीवन में ऐसे उदाहरण पेश किए, जो आज भी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बने हुए हैं।

भुलई भाई (फाइल फोटो)

यही वजह है कि जब उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) की परीक्षा में भुलई भाई से जुड़ा प्रश्न सामने आया, तो कुशीनगर के इस गुमनाम-से लगने वाले लेकिन बेहद प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्तित्व की चर्चा एक बार फिर तेज हो गई। हाल ही में मरणोपरांत पद्मश्री सम्मान मिलने से भी उनका नाम राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रहा है।

सरकारी नौकरी छोड़ी, जनसेवा को बनाया जीवन का लक्ष्य

भुलई भाई का जन्म 1 नवंबर 1914 को कैप्टनगंज क्षेत्र स्थित पगार छपरा गांव में हुआ था। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने शिक्षा विभाग में सरकारी सेवा की। उनके पास एक सुरक्षित और प्रतिष्ठित सरकारी स्वामित्व था, लेकिन राष्ट्र और समाज के लिए कुछ अलग करने की इच्छा ने उन्हें सार्वजनिक जीवन की ओर आकर्षित किया।

प्रधानमंत्री का स्वागत करते भुलई भाई

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनसंघ से जुड़े भुलई भाई ने सरकारी नौकरी छोड़कर सामाजिक एवं राजनीतिक गतिविधियों को अपना जीवन समर्पित कर दिया। बाद में उन्होंने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और नौरंगिया विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए।

खरीद-फरोख्त में दौर में सामने आया भुलई भाई का चरित्र

भुलई भाई के राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी चमत्कारिक घटनाओं में से एक वह प्रसंग है, जब कथित तौर पर उन पर राजनीतिक हिस्सेदारी और क्रॉस वोटिंग को प्रभावित करने का प्रयास किया गया था।

सीएम योगी के साथ भुलई भाई

मीडिया रिपोर्टों और उपलब्ध राजनीतिक विवरणों के अनुसार, उन्हें रुपयों से भरा एक बैग भेजा गया था। लेकिन जिस व्यक्ति को धन के जरिए प्रभावित करने की कोशिश की गई थी, उसने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के बजाय इसे सार्वजनिक करने का फैसला किया।

भुलई भाई बैग लेकर वरिष्ठ संघ नेताओं के पास पहुंचे। इसके बाद उनके मार्गदर्शन में वे उसी बैग को लेकर उत्तर प्रदेश विधानसभा पहुंचे। वहां उन्होंने कथित खरीद-फरोख्त के इस प्रयास को सदन के सामने उजागर किया। यही घटना बाद में भुलई भाई की राजनीतिक ईमानदारी और सिद्धांतों के प्रति अडिग प्रतिबद्धता की सबसे चर्चित मिसालों में शामिल हो गई।

केसरिया गमछा बनी पहचान, सादगी रही जीवनशैली

भुलई भाई की पहचान सिर्फ एक राजनेता के रूप में नहीं थी। उनका रहन-सहन बेहद सादा था। कंधे पर रहने वाला केसरिया गमछा उनकी सार्वजनिक पहचान का हिस्सा बन गया था।

रक्षा मंत्री व भुलई भाई

लंबे राजनीतिक जीवन में पद और प्रतिष्ठा मिलने के बावजूद उन्होंने अपनी जीवनशैली में दिखावे को स्थान नहीं दिया। यही सादगी उन्हें आम लोगों से जोड़ती रही।

आपातकाल के दौरान भी उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों के समर्थन में संघर्ष किया और जेल गए। उनके व्यक्तित्व की यही दृढ़ता उन्हें सामान्य राजनेताओं से अलग पहचान देती रही।

111 वर्ष की उम्र में निधन, मरणोपरांत मिला पद्मश्री

भुलई भाई ने लगभग 111 साल का जीवन देखा। 31 अक्टूबर 2024 को उनके निधन के बाद केंद्र सरकार ने उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित करने की घोषणा की।

यह सम्मान केवल उनके राजनीतिक जीवन की उपलब्धि नहीं, बल्कि उस सादगी और सार्वजनिक नैतिकता की भी राष्ट्रीय पहचान है, जिसके लिए वे जीवनभर जाने गए।

UP PCS में सवाल ने फिर बढ़ाई चर्चा

प्रतियोगी परीक्षाओं में ऐसे व्यक्तित्वों को शामिल किए जाने का उद्देश्य केवल अभ्यर्थियों का सामान्य ज्ञान परखना नहीं होता। ऐसे प्रश्नों के माध्यम से प्रशासनिक सेवा में आने वाले युवाओं को देश और प्रदेश के उन लोगों से परिचित कराया जाता है, जिन्होंने अपने आचरण से सार्वजनिक जीवन के मानदंड तय किए।

भुलई भाई का जीवन इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। उन्होंने सत्ता को लक्ष्य बनाने के बजाय सिद्धांतों के साथ सार्वजनिक जीवन जीने को प्राथमिकता दी।

कुशीनगर से निकलकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाने वाले भुलई भाई को पद्मश्री मिलना और फिर UP PCS परीक्षा में उनका नाम सामने आना इस बात का संकेत है कि इतिहास में दर्ज होने के लिए केवल बड़ा पद जरूरी नहीं होता।

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