गाजियाबाद: यूपी की राजधानी लखनऊ में 22 जून को हुए भीषण अग्निकांड ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया। इस दर्दनाक हादसे में 15 छात्रों की मौत ने न सिर्फ कई परिवारों को गहरे शोक में डुबो दिया, बल्कि शैक्षणिक संस्थानों और बहुमंजिला इमारतों में फायर सेफ्टी व्यवस्थाओं की वास्तविक स्थिति पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस घटना के बाद गाजियाबाद में भी अग्निशमन विभाग अचानक हरकत में आ गया है, जिससे यह प्रश्न उठने लगा है कि क्या प्रशासन केवल बड़े हादसों के बाद ही जागता है।
लखनऊ की घटना के बाद गाजियाबाद में मुख्य अग्निशमन अधिकारी राहुल पाल के नेतृत्व में आरडीसी, राजनगर और साहिबाबाद जैसे प्रमुख क्षेत्रों में कोचिंग सेंटरों और व्यावसायिक इमारतों की जांच शुरू की गई। शुरुआती निरीक्षण में कई चिंताजनक खामियां सामने आईं। कई संस्थानों में लगे फायर एक्सटिंग्विशर की वैधता अवधि समाप्त हो चुकी थी, लेकिन उन्हें अब भी केवल औपचारिकता के तौर पर दीवारों पर टांगा गया था। कई जगह आपातकालीन निकास या तो मौजूद नहीं मिले, और जहां थे भी, वहां रास्ते बंद, अवरुद्ध या ताले लगे पाए गए।
विभाग की कार्रवाई के दौरान 206 इमारतों का निरीक्षण किया गया, जिनमें से नियमों की अनदेखी करने वाले 56 संस्थानों के खिलाफ सीलिंग की कार्रवाई शुरू कर दी गई। मामला केवल कोचिंग सेंटरों तक सीमित नहीं है। गाजियाबाद की 52 बहुमंजिला आवासीय सोसायटियां भी फायर सेफ्टी मानकों पर गंभीर रूप से खरा नहीं उतर रही हैं।
इन सोसायटियों में रहने वाले हजारों परिवार सुरक्षा के लिहाज से जोखिमपूर्ण माहौल में जीवन बिता रहे हैं। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई स्थानों पर अग्निशमन व्यवस्था अधूरी, निष्क्रिय या कागजों तक सीमित बताई जा रही है। इसके बावजूद कार्रवाई के नाम पर अब तक केवल नोटिस जारी किए जाने की प्रक्रिया ही प्रमुख रूप से सामने आई है।
इस पूरी स्थिति ने प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। यदि निरीक्षण में इतनी बड़ी संख्या में खामियां मिल रही हैं, तो फिर एनओसी जारी करते समय इन व्यवस्थाओं की जांच कितनी गंभीरता से की गई थी? क्या सुरक्षा मानकों का पालन केवल दस्तावेजों तक सीमित रहा? क्या संबंधित विभागों ने समय रहते निगरानी और अनुपालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी नहीं निभाई?
लखनऊ की त्रासदी ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि फायर सेफ्टी को कागजी प्रक्रिया मानने की प्रवृत्ति कितनी खतरनाक साबित हो सकती है। गाजियाबाद में अब जो कार्रवाई शुरू हुई है, वह आवश्यक जरूर है, लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि इसे महज तात्कालिक प्रतिक्रिया बनाकर न छोड़ा जाए। जनता को अब केवल नोटिस और निरीक्षण की खबरें नहीं, बल्कि स्थायी सुधार, जवाबदेही तय करने वाली कार्रवाई और सुरक्षा मानकों के वास्तविक पालन की गारंटी चाहिए।
यदि प्रशासन ने समय रहते शैक्षणिक संस्थानों, व्यावसायिक इमारतों और बहुमंजिला सोसायटियों में सुरक्षा मानकों को सख्ती से लागू नहीं किया, तो किसी बड़े हादसे की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में जरूरत सिर्फ कार्रवाई दिखाने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था खड़ी करने की है जो किसी भी संभावित त्रासदी को होने से पहले रोक सके।


