महराजगंज: नौतनवां ब्लॉक क्षेत्र की ग्राम पंचायत रेहरा टोला महुलानी में आयोजित नौ दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा नवाह ज्ञान यज्ञ के सातवें दिन श्रद्धा, भक्ति और उल्लास से परिपूर्ण वातावरण देखने को मिला। इस अवसर पर कथा व्यास पंडित माधवाचार्य ने भगवान श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणी के विवाह प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया, जिसे सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।

कथा व्यास ने बताया कि विदर्भ नरेश भीष्मक के घर जन्मीं रुक्मिणी बाल्यकाल से ही भगवान श्रीकृष्ण को अपने जीवनसाथी के रूप में स्वीकार कर चुकी थीं। किंतु उनके भ्राता उनका विवाह शिशुपाल से कराना चाहते थे, जिससे रुक्मिणी अत्यंत दुखी हो गईं। इसी बीच सुदेव नामक ब्राह्मण के माध्यम से रुक्मिणी ने सात श्लोकों में अपना पत्र श्रीकृष्ण तक पहुंचाया, जिसमें उन्होंने अपने हृदय की अभिलाषा के साथ स्वयं को प्राप्त करने का उपाय भी बताया।
कथा के अनुसार रुक्मिणी प्रतिदिन पार्वती पूजन के लिए मंदिर जाती थीं। उसी अवसर का लाभ उठाकर भगवान श्रीकृष्ण वहां पहुंचे और रुक्मिणी का हरण कर उन्हें द्वारिका ले गए। बाद में रुक्मिणी के पिता भीष्मक ने पूरे विधि-विधान और रीति-रिवाज के साथ भगवान श्रीकृष्ण से अपनी पुत्री का विवाह सम्पन्न कराया। विवाह के पावन अवसर पर देवताओं द्वारा पुष्पवर्षा की गई और मंगलाचार से वातावरण आनंदमय हो उठा।
इसके साथ ही कथा व्यास ने महारास लीला का भी सजीव वर्णन किया। उन्होंने बताया कि गोपियों की निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में यमुना तट पर महारास रचाया। बांसुरी की मधुर धुन सुनकर गोपियां अपनी सुध-बुध खो बैठीं और प्रभु के समीप पहुंच गईं। यह लीला पूर्णतः आध्यात्मिक और वासना रहित प्रेम का प्रतीक मानी जाती है। मान्यता है कि वृंदावन स्थित निधिवन वही पावन स्थल है, जहां यह दिव्य महारास संपन्न हुआ।
कथा के दौरान पंडित चंद्रभूषण शास्त्री, रमेश पाण्डेय, मुख्य यजमान लौजारी पत्नी विन्द्रावन पाल, उमेश पाण्डेय, सुदर्शन पाल, दशरथ, महेन्द्र, शंकर सहित बड़ी संख्या में क्षेत्रीय धर्मानुरागी श्रद्धालु उपस्थित रहे और कथा श्रवण का पुण्य लाभ प्राप्त किया।


