नई दिल्ली: दीपावली, जिसे ‘प्रकाश का पर्व’ कहा जाता है, भारतीय संस्कृति में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह केवल दीप जलाने का दिन नहीं, बल्कि अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। दिवाली के दिन धन और ऐश्वर्य की देवी मां लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व होता है।
लेकिन दीपावली की रात एक और परंपरा सदियों से चली आ रही है- जुए यानी ताश के पत्तों का खेल। सवाल यह उठता है कि यह परंपरा शुभ मानी जाती है या अशुभ? आइए जानते हैं इसके पीछे की धार्मिक मान्यता और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि।
दिवाली पर जुए की शुरुआत कहां से हुई?
प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, दीपावली के अगले दिन अन्नकूट या गोवर्धन पूजा के अवसर पर देवी पार्वती और भगवान शिव ने पासों का खेल खेला था। कथा के अनुसार, इस खेल में भगवान शिव हार गए थे। तभी से यह मान्यता बन गई कि जो भी दीपावली की रात जुआ खेलता है, उसके घर में वर्षभर समृद्धि बनी रहती है। इसी वजह से आज भी कई लोग दीपावली पर ताश खेलना शुभ मानते हैं।
महाभारत की कथा से जुड़ी एक चेतावनी
एक अन्य मान्यता महाभारत काल से जुड़ी है। कहा जाता है कि पांडवों ने इसी दिन जुए में अपना सब कुछ हार दिया था, जिसके कारण उन्हें 12 वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास भोगना पड़ा। युधिष्ठिर ने इस घटना के माध्यम से यह संदेश दिया कि जुआ एक विनाशकारी आदत है जो व्यक्ति को पतन की ओर ले जाती है। इसलिए, कुछ लोग दीपावली पर जुआ खेलना अशुभ मानते हैं।
धार्मिक दृष्टि से क्या कहा गया है?
धर्मग्रंथों में जुआ खेलना निषिद्ध बताया गया है, परंतु दीपावली की रात को महानिशा की रात कहा जाता है जो शुभता से भरपूर मानी जाती है। कुछ मान्यताओं के अनुसार, इस रात जुए में जीतने से पूरे वर्ष आर्थिक लाभ और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
निष्कर्षतः दीपावली पर जुआ खेलना आस्था और मान्यता का विषय है। यह परंपरा जहां एक ओर समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है, वहीं दूसरी ओर यह संयम और विवेक का भी संदेश देती है- क्योंकि किसी भी अति का परिणाम सदैव विनाशकारी होता है।


