नई दिल्ली: दुनिया की आर्थिक संरचना तेज़ी से बदल रही है और इसका सबसे स्पष्ट संकेत वैश्विक बैंकिंग व्यवस्था में दिखाई देता है। ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, कुल संपत्ति (Total Assets) के आधार पर दुनिया के सबसे बड़े बैंक अब एशिया के इर्द-गिर्द केंद्रित हो चुके हैं। यह बदलाव केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में हो रहे बड़े परिवर्तन का संकेत है।
S&P Global की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के शीर्ष चार बैंक चीन से हैं। इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल बैंक ऑफ चाइना (ICBC) $6.7 ट्रिलियन की संपत्ति के साथ लगातार दुनिया का सबसे बड़ा बैंक बना हुआ है। इसके बाद एग्रीकल्चरल बैंक ऑफ चाइना, चाइना कंस्ट्रक्शन बैंक और बैंक ऑफ चाइना का स्थान आता है। इन बैंकों की भूमिका केवल घरेलू वित्तपोषण तक सीमित नहीं है, बल्कि ये अंतरराष्ट्रीय व्यापार, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और बहुराष्ट्रीय परियोजनाओं में भी निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ जैसी वैश्विक योजनाओं में इनकी सक्रिय भागीदारी चीन की वित्तीय कूटनीति को मजबूती देती है।
चीनी बैंकों के इस दबदबे के बीच अमेरिका का JPMorgan Chase $4.0 ट्रिलियन की संपत्ति के साथ पश्चिमी दुनिया का सबसे बड़ा और प्रभावशाली बैंक बना हुआ है। निवेश बैंकिंग, डिजिटल फाइनेंस और वैश्विक कैपिटल मार्केट्स में इसकी मजबूत पकड़ इसे प्रतिस्पर्धा में बनाए रखती है। वहीं, यूरोप के HSBC और BNP Paribas जैसे बैंक एसेट साइज में भले ही एशियाई संस्थानों से पीछे हों, लेकिन वैश्विक नेटवर्क, लिक्विडिटी मैनेजमेंट और बहुराष्ट्रीय संचालन में उनका अनुभव आज भी अहम माना जाता है।
भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के लिए यह दौर उम्मीदों से भरा है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) $0.9 ट्रिलियन की कुल संपत्ति के साथ दुनिया के शीर्ष 50 बैंकों में शामिल होकर भारत की वित्तीय शक्ति का प्रतीक बन चुका है। सरकारी योजनाओं, ग्रामीण बैंकिंग और विशाल शाखा नेटवर्क में SBI की भूमिका केंद्रीय है। इसके साथ ही, निजी क्षेत्र में HDFC Bank $0.5 ट्रिलियन की संपत्ति के साथ तेज़ी से आगे बढ़ रहा है और वैश्विक मंच पर भारत की मौजूदगी को मजबूत कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी बैंक की कुल संपत्ति उसकी ऋण देने की क्षमता, जोखिम सहने की ताकत और आर्थिक संकट से निपटने की क्षमता को दर्शाती है। आने वाले वर्षों में डिजिटल बैंकिंग, फिनटेक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते उपयोग से वैश्विक बैंकिंग रैंकिंग में और बदलाव देखने को मिल सकते हैं। जैसे-जैसे भारत और चीन जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाएं मजबूत होंगी, वैश्विक वित्तीय शक्ति संतुलन भी नए सिरे से परिभाषित होगा।


