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  • 02/03/2026
  • Last Update 01/03/2026 8:01 pm
  • Lucknow

कुशीनगर में श्रद्धा और उल्लास के साथ मना बसंत पंचमी पर्व: गांव-गांव, गली-गली गूंजी सरस्वती वंदना

कुशीनगर में श्रद्धा और उल्लास के साथ मना बसंत पंचमी पर्व: गांव-गांव, गली-गली गूंजी सरस्वती वंदना

कुशीनगर: बसंत पंचमी भारतीय संस्कृति का वह उत्सव है, जो केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि प्रकृति, ज्ञान और मानव चेतना के पुनर्जागरण का प्रतीक है। माघ शुक्ल पंचमी के अवसर पर कुशीनगर जनपद में शिक्षा संस्थानों से लेकर गांवों की गलियों तक माँ सरस्वती की आराधना के साथ उल्लास और श्रद्धा का वातावरण देखने को मिला।

स्कूलों, कॉलेजों, कोचिंग संस्थानों, प्रमुख बाजारों और सार्वजनिक स्थलों पर ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की प्रतिमाएं स्थापित कर विधिवत पूजन किया गया। छात्र-छात्राओं के साथ बड़ी संख्या में अभिभावकों और बुजुर्गों ने भी सहभागिता कर ज्ञान, विवेक और सद्बुद्धि का आशीर्वाद प्राप्त किया।

युवाओं ने दिया सांस्कृतिक एकता का संदेश

ग्राम सभा मुकुन्दपुर में नवयुवक छात्रों द्वारा बसंत पंचमी का आयोजन विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। युवाओं ने सामूहिक रूप से माँ सरस्वती की प्रतिमा स्थापित कर पूजन-वंदन किया और महाप्रसाद का वितरण कर सामाजिक सौहार्द का संदेश दिया। आयोजन में हिमेश मिश्रा, अनुप मिश्रा, अंकित, आशीष, सत्यम, समकक्ष मिश्रा, रौशन, आर्यन, हिमांशु सहित अनेक ग्रामीण उपस्थित रहे।

ऋतु परिवर्तन नहीं, चेतना का उत्सव

भारतीय परंपरा में त्योहार केवल मौसम या तिथियों से नहीं जुड़े होते, बल्कि वे जीवन में नई ऊर्जा और सकारात्मक दृष्टि का संचार करते हैं। बसंत पंचमी शीत ऋतु की निष्क्रियता से निकलकर सक्रियता, सृजन और उत्साह की ओर बढ़ने का संकेत है। यह पर्व मनुष्य को ठहराव से गति की ओर ले जाता है।

सृष्टि को वाणी देने वाली देवी

पौराणिक मान्यता के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में संसार मौन था। ब्रह्मा द्वारा जल छिड़कते ही माँ सरस्वती का प्राकट्य हुआ और उनके वीणा-नाद से सृष्टि को वाणी और अभिव्यक्ति प्राप्त हुई। इसी कारण बसंत पंचमी को सरस्वती जयंती के रूप में भी मान्यता प्राप्त है।

ज्ञान से संस्कार तक

माँ सरस्वती केवल विद्या की देवी नहीं, बल्कि विवेक, संयम और संवेदनशीलता की अधिष्ठात्री हैं। भारतीय दर्शन में ज्ञान का उद्देश्य मनुष्य को अधिक मानवीय बनाना है। यही कारण है कि विद्यार्थी, शिक्षक, साहित्यकार, कलाकार और संगीतकार इस दिन विशेष रूप से उनकी आराधना करते हैं।

शुभ कार्यों का आरंभ

बसंत पंचमी को विद्यारंभ, गृह प्रवेश, व्यवसाय आरंभ और नए कार्यों के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। कई राज्यों में बच्चों को इसी दिन पहली बार अक्षर ज्ञान कराया जाता है।

रंगों और उल्लास की शुरुआत

ब्रज क्षेत्र में बसंत पंचमी के साथ ही होली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती हैं। मंदिरों में गुलाल अर्पित किया जाता है और लोक-संगीत की स्वर-लहरियाँ वातावरण को उल्लासपूर्ण बना देती हैं।

भारत की विविधता में बसंत पंचमी

देश के विभिन्न हिस्सों में यह पर्व अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है। बंगाल में सरस्वती पूजा, पंजाब में पतंगबाजी और लोकगीत, बिहार-उड़ीसा में कृषि परंपराएँ तथा मथुरा-वृंदावन में सांस्कृतिक उत्सव इसकी जीवंत पहचान हैं।

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