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  • July 15, 2026
  • Last Update July 14, 2026 10:20 PM
  • Lucknow

गाजियाबाद के गांवों में फैक्ट्रियों का जहरीला पानी, ग्रामीण बोले- “या तो यह जहर बंद कराइए, या हमें मरने की इजाजत दीजिए”

गाजियाबाद के गांवों में फैक्ट्रियों का जहरीला पानी, ग्रामीण बोले- “या तो यह जहर बंद कराइए, या हमें मरने की इजाजत दीजिए”

गाजियाबाद: दिल्ली प्रदेश से सटे गाजियाबाद के लोनी क्षेत्र में स्थित ट्रॉनिका सिटी औद्योगिक क्षेत्र का तेजी से बढ़ता औद्योगिक विकास अब आसपास के गांवों के लिए गंभीर खतरे का कारण बन गया है। यहां की फैक्ट्रियों से निकलने वाला केमिकल युक्त अपशिष्ट जल ग्रामीणों के पीने के पानी में मिल रहा है, जिससे गांवों में स्वास्थ्य संकट गहराता जा रहा है।

ग्रामीणों का आरोप है कि वर्षों से बह रहा यह जहरीला पानी उनके भू-जल को प्रदूषित कर रहा है। शकलपुरा और जवाली गांवों में पानी का टीडीएस स्तर पहले 100 था, जो अब बढ़कर 1500 के पार पहुंच चुका है। विशेषज्ञों के अनुसार यह स्तर मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत खतरनाक है और गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है।

गाँव में बह रहा दूषित पानी

गाँवों में फैल रहा बीमारियों का खतरा

ग्रामीणों की जानकारी के मुताबिक, शकलपुरा गांव में 40 से अधिक लोग कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं, जबकि जवाली में यह संख्या 100 से भी अधिक है। त्वचा रोग, पेट की बीमारियां, सांस की तकलीफ और अन्य गंभीर रोग गांवों में आम हो चुके हैं। लोग बीमारी और इलाज की लागत से तंग आकर अपना गांव छोड़ने को मजबूर हैं।

ट्रीटमेंट प्लांट सिर्फ दिखावे तक सीमित

ट्रॉनिका सिटी औद्योगिक क्षेत्र को यूपीसीडा द्वारा 25 साल पहले विकसित किया गया था। हजारों फैक्ट्रियों में से सैकड़ों केमिकल आधारित उद्योग हैं। इन फैक्ट्रियों के अपशिष्ट जल को शुद्ध करने के लिए ट्रीटमेंट प्लांट लगाए गए हैं। लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि प्लांट और पाइपलाइन की पुरानी स्थिति के कारण जहरीला पानी सीधे गांवों के नजदीकी नहरों में पहुंच रहा है।

ग्रामीण बनाम औद्योगिक विकास

ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन और उद्योगपतियों ने अबतक उनकी आवाज़ नहीं सुनी। उनका दर्द साफ है, या तो जहरीले पानी पर तुरंत रोक लगाई जाए, या उन्हें इस धीमी मौत से छुटकारा दिया जाए।

यह मामला सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि मानव जीवन के मौलिक अधिकार का भी है। विकास की आड़ में अगर लोगों का स्वास्थ्य खतरे में पड़ रहा है, तो सवाल यह उठता है कि क्या यही है हमारी तरक्की?

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