गाजियाबाद: उत्तर प्रदेश सरकार की नई ई-पंजीकरण व्यवस्था के विरोध में गाजियाबाद की तीनों तहसीलों सदर, लोनी और मोदीनगर में रजिस्ट्री कार्य पिछले करीब 15 दिनों से पूरी तरह ठप पड़ा है। वकीलों, स्टाम्प वेंडरों और बैनामा लेखकों की अनिश्चितकालीन हड़ताल के चलते न केवल संपत्ति की खरीद-फरोख्त रुक गई है, बल्कि हजारों परिवारों की योजनाएं, बैंक लोन, शादी-ब्याह से जुड़े काम और जरूरी दस्तावेजी प्रक्रियाएं भी अधर में लटक गई हैं।
सरकार और आंदोलनकारी संगठनों के बीच जारी इस टकराव का सबसे बड़ा खामियाजा आम जनता को उठाना पड़ रहा है। हड़ताल कर रहे अधिवक्ताओं और दस्तावेज लेखकों का कहना है कि ई-पंजीकरण की नई व्यवस्था पारंपरिक रजिस्ट्री तंत्र से जुड़े हजारों लोगों के रोजगार पर सीधा संकट खड़ा कर रही है। उनका आरोप है कि सरकार ने बिना पर्याप्त संवाद और तैयारी के पूरी प्रक्रिया को डिजिटल और निजी एजेंसियों पर आधारित मॉडल की ओर मोड़ दिया है, जिससे स्टाम्प वेंडर, बैनामा लेखक और उनके सहयोगी धीरे-धीरे व्यवस्था से बाहर हो जाएंगे।
आंदोलनकारियों का यह भी कहना है कि नई प्रणाली में डेटा सुरक्षा, तकनीकी खामियों और फर्जीवाड़े की आशंका को लेकर भी गंभीर सवाल हैं, लेकिन सरकार इन चिंताओं को नजरअंदाज कर रही है। लोनी समेत जिले की विभिन्न तहसीलों में बड़ी संख्या में परिवार वर्षों से इसी काम पर निर्भर हैं।
वहीं शासन और स्टाम्प एवं पंजीकरण विभाग इस नई व्यवस्था को सुधार की दिशा में बड़ा कदम बता रहे हैं।
विभाग का कहना है कि ई-पंजीकरण से रजिस्ट्री प्रक्रिया अधिक पारदर्शी होगी, बिचौलियों की भूमिका घटेगी, दस्तावेजों का सत्यापन मजबूत होगा और जमीन से जुड़े फर्जीवाड़े पर रोक लगाने में मदद मिलेगी। सरकार का दावा है कि डिजिटल प्रणाली लागू होने से आम लोगों को दफ्तरों के चक्कर कम लगाने पड़ेंगे और पूरी प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित व जवाबदेह बनेगी। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इस संघर्ष के बीच आम आदमी सबसे ज्यादा परेशान है।
जिन लोगों ने बैंक से लोन लेकर मकान या प्लॉट खरीदा है, उनकी रजिस्ट्री नहीं हो पा रही। कई लोग भुगतान कर चुके हैं, लेकिन कानूनी प्रक्रिया अधूरी होने के कारण कब्जा और स्वामित्व दोनों अटके हुए हैं। लोन की किस्तें चल रही हैं, पर रजिस्ट्री के अभाव में खरीदार असमंजस और तनाव में हैं। कई परिवारों के लिए जमीन या मकान की खरीद केवल निवेश नहीं, बल्कि जीवन भर की जमा-पूंजी और भविष्य की सुरक्षा का सवाल है। ऐसे में रजिस्ट्री ठप होने से उनकी आर्थिक और मानसिक परेशानी लगातार बढ़ रही है।
इसका असर केवल संपत्ति रजिस्ट्री तक सीमित नहीं है। विवाह पंजीकरण और अन्य जरूरी दस्तावेजी कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं। जिन लोगों को पासपोर्ट, वीजा, बैंकिंग या अन्य कानूनी प्रक्रियाओं के लिए पंजीकरण संबंधी दस्तावेज चाहिए, वे भी परेशान हैं। दूसरी ओर, रजिस्ट्री कार्य बंद रहने से सरकार को भी स्टाम्प शुल्क और पंजीकरण शुल्क के रूप में रोजाना भारी राजस्व नुकसान उठाना पड़ रहा है।
जानकारों के मुताबिक, गाजियाबाद जैसे जिले में यह नुकसान करोड़ों रुपये प्रतिदिन तक पहुंच सकता है। सबसे अहम सवाल यह है कि आखिर इस टकराव का अंत कैसे होगा? ई-पंजीकरण जैसी व्यवस्था समय की जरूरत हो सकती है, लेकिन किसी भी बड़े बदलाव को लागू करने से पहले उससे प्रभावित वर्गों को विश्वास में लेना, उनकी भूमिका स्पष्ट करना और उन्हें नई प्रणाली के अनुरूप प्रशिक्षित करना सरकार की जिम्मेदारी है। दूसरी तरफ़ आंदोलनकारी पक्ष को भी यह समझना होगा कि लंबी हड़ताल का सबसे बड़ा बोझ उसी जनता पर पड़ता है, जिसके हितों की बात अक्सर हर पक्ष करता है।
गाजियाबाद की तहसीलों में 15 दिन से ठप पड़ी रजिस्ट्री केवल प्रशासनिक गतिरोध नहीं, बल्कि आम लोगों की उम्मीदों, सौदों और जीवन भर की कमाई पर लगा ताला है। अब जरूरत इस बात की है कि सरकार और आंदोलनकारी संगठन जिद छोड़कर बातचीत की मेज पर आएं और ऐसा रास्ता निकालें, जिसमें व्यवस्था का आधुनिकीकरण भी हो और वर्षों से इस व्यवस्था से जुड़े लोगों की आजीविका भी सुरक्षित रहे। क्योंकि रजिस्ट्री का हर कागज केवल जमीन का दस्तावेज नहीं, बल्कि किसी परिवार के भविष्य का आधार होता है।


