मुंबई: हिंदी सिनेमा में ऐसा दौर भी था जब पर्दे पर ग्लैमर की परिभाषा बेहद सीमित हुआ करती थी। हीरोइनें साड़ी, घांघरा-चोली या साधारण भारतीय परिधान में ही दर्शकों के सामने आती थीं। उसी दौर में एक अभिनेत्री ने अपने सौंदर्य, आत्मविश्वास और अद्भुत व्यक्तित्व से बॉलीवुड में ग्लैमर का पहला अध्याय लिखा। यह अभिनेत्री थीं बेगम पारा, जिन्हें भारतीय सिनेमा की पहली ग्लैमर गर्ल कहा जाता है।

झेलम से बॉलीवुड तक का सफ़र
25 दिसंबर 1926 को झेलम (पाकिस्तान) में जन्मी जुबैदा-उल-हक, अपने परिवार की ही तरह पढ़ी-लिखी और संस्कारी थीं। उनके पिता मियां एहसान-उल-हक जालंधर के सम्मानित जज थे, जबकि बड़े भाई मसरूरुल हक 1930 के दशक में फिल्मों में करियर बनाने के लिए बॉम्बे आ चुके थे। भाई के पास आने-जाने के दौरान बेगम पारा पहली बार फिल्मी दुनिया के संपर्क में आईं। स्टूडियो की रौनक, कैमरों की चमक और कलाकारों के बीच काम करने वाला माहौल उन्हें भीतर तक आकर्षित कर गया, और उन्होंने ठान लिया कि वह भी अभिनेत्री ही बनेंगी।

उनके भीतर की इस इच्छा को पर लगा 1944 में, जब उन्हें पहली फिल्म ‘चांद’ मिली। हालांकि फिल्म में उनका किरदार बड़ा नहीं था, लेकिन स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी इतनी प्रभावशाली थी कि इंडस्ट्री के लोग उनकी खूबसूरती और कैमरा-फ्रेंडली चेहरे के दीवाने हो गए। धीरे-धीरे फिल्में मिलती रहीं, लेकिन उनकी असली पहचान अभिनय से नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक फोटोशूट से बनी।

मैगजीन फोटोशूट ने मचाया तहलका
40-50 के दशक में जब भारतीय सिनेमा बेहद संकोच से भरा हुआ था, बेगम पारा ने Life Magazine के लिए मशहूर फोटोग्राफर जेम्स बुर्के के साथ एक बोल्ड फोटोशूट करवाया। हाथ में सिगरेट, खुले बिखरे बाल, फैशनेबल पोशाक और चेहरे पर ऐसा आत्मविश्वास जो उस समय न किसी ने देखा था, न सोचा था। उनके इस फोटोशूट ने देशभर में तहलका मचा दिया। एक ही रात में वह भारत की पहली ‘Bombshell’, ‘Pin-Up Girl’ और ‘Glamour Girl’ बन गईं।

यहां तक कि उनकी लोकप्रियता विदेशों तक फैल गई। कहा जाता है कि अमेरिकी सैनिक युद्ध पर जाते समय अपनी जेब में बेगम पारा की तस्वीरें रखते थे। वह वह दौर था जब किसी भारतीय अभिनेत्री के लिए ऐसी अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलना असाधारण था।
निजी जीवन में बेगम पारा की कहानी भी खूब चर्चित रही। उन्होंने अभिनेता और दिलीप कुमार के छोटे भाई नासिर खान से शादी की। दोनों की जोड़ी इंडस्ट्री में अक्सर चर्चा का विषय बनी रहती थी। लेकिन 1974 में नासिर खान के निधन ने बेगम पारा को तोड़ दिया। वह कुछ समय के लिए पाकिस्तान चली गईं, लेकिन दो साल बाद ही भारत लौट आईं, क्योंकि फिल्मों और मुंबई से उनका रिश्ता बहुत गहरा था।

बेगम पारा ने ‘जंजीर’, ‘सोहनी महिवाल’, ‘नील कमल’, ‘लैला मजनू’ और ‘किस्मत का खेल’ जैसी फिल्मों में काम किया। उम्र के साथ अभिनय से दूरी बढ़ी, लेकिन 2007 में संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘सांवरिया’ में वह एक बार फिर पर्दे पर लौटीं। इस फिल्म में उन्होंने दादी का किरदार निभाते हुए दर्शकों का दिल जीत लिया।
2008 में बेगम पारा ने दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन भारतीय सिनेमा में ग्लैमर की शुरुआत हमेशा उनके नाम से जुड़ी रहेगी। बेगम पारा सिर्फ एक अभिनेत्री नहीं थीं, बल्कि वह साहस थीं, आत्मविश्वास थीं और उस दौर की वो पगडंडी थीं जिसने बॉलीवुड को ग्लैमर की राह दिखाई।


