गाजियाबाद: धर्म, स्वतंत्रता, मानव गरिमा और भारतीय सांस्कृतिक चेतना की रक्षा के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग करने वाले हिन्द की चादर श्री गुरु तेग बहादुर जी के 350वें बलिदान दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, गाजियाबाद महानगर द्वारा एक गरिमामय वैचारिक गोष्ठी का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ गुरुद्वारे से पधारे रागी जत्थे द्वारा शब्द कीर्तन के साथ हुआ, जिसने वातावरण को गुरु परंपरा, त्याग और साधना की भावभूमि से ओतप्रोत कर दिया।
गोष्ठी के मुख्य वक्ता दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रविन्द्र सिंह ने कहा कि संघ द्वारा बलिदान दिवस मनाने का उद्देश्य केवल इतिहास का स्मरण नहीं, बल्कि उस त्याग परंपरा को वर्तमान पीढ़ी के जीवन में जीवंत करना है। उन्होंने कहा कि श्री गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान सम्पूर्ण मानवता की धार्मिक स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा के लिए था, जो भारतीय राष्ट्रचेतना का मूल तत्व है।
उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए बताया कि औरंगजेब की जबरन धर्मांतरण की नीति के विरोध में तथा कश्मीरी पंडितों की धर्मरक्षा की पुकार पर गुरु तेग बहादुर जी ने निर्भीक होकर उनका साथ दिया, जिसके परिणामस्वरूप सन् 1675 में दिल्ली में उन्हें बलिदान देना पड़ा। यह शहादत धार्मिक स्वतंत्रता और मानवीय मूल्यों की रक्षा का विश्वविरल उदाहरण है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सरदार मलकीत सिंह जस्सर ने कहा कि गुरु तेग बहादुर जी का जीवन और बलिदान भारत की आत्मा-सहिष्णुता, साहस और समरसता का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि संघ ऐसे आयोजनों के माध्यम से समाज में त्याग, कर्तव्यबोध, राष्ट्रनिष्ठा और सामाजिक एकता के मूल्यों को सुदृढ़ करता है।
कार्यक्रम में विभिन्न गुरुद्वारा समितियों के पदाधिकारियों की उल्लेखनीय सहभागिता रही। हरमीत सिंह (अध्यक्ष, बजरिया गुरुद्वारा), जगमोहन (प्रधान, गांधी नगर गुरुद्वारा) और सरदार रविंद्र सिंह (प्रधान, कवि नगर गुरुद्वारा) ने गुरु साहिब के आदर्शों को सामाजिक जीवन में आत्मसात करने तथा राष्ट्र की एकता व सांस्कृतिक अखंडता के लिए सतत प्रयास का संकल्प व्यक्त किया।
कार्यक्रम के माध्यम से यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि बलिदान दिवस मनाना राष्ट्र की स्मृति को जागृत रखना है, ताकि समाज यह समझ सके कि आज की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वाधीनता और सामाजिक सौहार्द असंख्य महापुरुषों के त्याग का परिणाम है। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रबोध, सांस्कृतिक समरसता और सामाजिक एकता के भाव के साथ हुआ।


