गाज़ियाबाद: केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी अमृत सरोवर योजना के तहत लोनी में विकसित किया गया तालाब आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। जिस सरोवर को जल संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और स्थानीय पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से तैयार किया गया था, वह अब गंदगी, अव्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही का प्रतीक बन चुका है। जमीनी हकीकत सरकारी दावों से बिल्कुल उलट नजर आ रही है।
मौके पर किए गए रियलिटी चेक में सरोवर के चारों ओर कूड़ा-कचरे का अंबार दिखाई दिया। प्लास्टिक की बोतलें, पॉलिथीन और अन्य गंदगी खुलेआम फैली हुई है। सरोवर का पानी जलकुंभी और गाद से भरा हुआ है, जिससे तेज दुर्गंध उठ रही है और आसपास रहना मुश्किल हो गया है। यह स्थिति न केवल पर्यावरण के लिए हानिकारक है, बल्कि स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बन रही है।
सरोवर के सौंदर्यीकरण के लिए बनाई गई व्यवस्थाएं भी दम तोड़ चुकी हैं। बाउंड्री वॉल कई स्थानों पर टूटी हुई है, जिससे पशुओं और असामाजिक तत्वों का प्रवेश आसान हो गया है। बैठने के लिए लगाई गई बेंच या तो गायब हैं या क्षतिग्रस्त अवस्था में पड़ी हैं। इसके अलावा, रात में रोशनी के लिए लगाए गए लाइट और आकर्षण बढ़ाने के लिए लगाए गए फव्वारे लंबे समय से बंद पड़े हैं, जिससे पूरा परिसर सुनसान और उपेक्षित नजर आता है।
स्थानीय लोगों में इस स्थिति को लेकर गहरा रोष है। निवासी रामकिशन का कहना है कि उद्घाटन के समय बड़े-बड़े वादे किए गए थे, लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि वहां खड़ा होना भी मुश्किल हो गया है। वहीं, गृहणी सुनीता बताती हैं कि बरसात के दौरान सरोवर का गंदा पानी ओवरफ्लो होकर घरों में घुस जाता है, जिससे बीमारी फैलने का खतरा बढ़ जाता है।
प्रशासन की तरफ से इस मामले में कोई ठोस प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। नगर पालिका के अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला। हालांकि, विभाग के एक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सरोवर के रखरखाव के लिए पर्याप्त बजट उपलब्ध नहीं कराया जाता, जिसके कारण नियमित सफाई और मरम्मत कार्य नहीं हो पाता।
गौरतलब है कि वर्ष 2023-24 में इस सरोवर के जीर्णोद्धार पर लगभग 75 लाख से 1 करोड़ रुपये तक खर्च किए गए थे। इसके बावजूद महज दो वर्षों में ही सरोवर की स्थिति बद से बदतर हो गई है, जो सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
अब सवाल यह उठता है कि आखिर इतने बड़े बजट के खर्च के बाद भी जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की जा रही? क्या संबंधित विभाग इस समस्या का समाधान निकालने के लिए कोई ठोस कदम उठाएगा, या फिर यह सरोवर यूं ही उपेक्षा का शिकार बना रहेगा?


