गाजियाबाद: यूपी का गाजियाबाद जनपद इन दिनों प्रशासनिक सक्रियता, पुलिस कार्रवाई और राजनीतिक बयानबाजी के बीच सुर्खियों में है, लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या व्यवस्था केवल किसी बड़ी घटना के बाद ही जागती है? खोड़ा क्षेत्र में किशोर सूर्य चौहान की नृशंस हत्या और उसके बाद हुए पुलिस एक्शन ने कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
वारदात के बाद पुलिस कमिश्नरेट की ओर से ‘ऑपरेशन क्लीन स्वीप’ जैसे अभियान चलाए जा रहे हैं, अपराधियों पर शिकंजा कसने, अवैध गतिविधियों में लिप्त प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई करने और संदिग्ध तत्वों से माफीनामा भरवाने जैसे कदमों का दावा भी किया जा रहा है, लेकिन जनता पूछ रही है कि जब खतरे के संकेत पहले से मौजूद थे तो प्रशासन पहले क्यों नहीं चेता?
यही सवाल पुलिस व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी उठता है। यदि स्थानीय खुफिया तंत्र, क्षेत्रीय निगरानी और गश्ती व्यवस्था प्रभावी होती, तो क्या ऐसी वारदातों को रोका नहीं जा सकता था? हर बड़ी घटना के बाद अचानक तेज हो जाने वाली पुलिस कार्रवाई यह आभास देती है कि सिस्टम की सक्रियता अक्सर प्रतिक्रिया तक सीमित रह जाती है, जबकि जरूरत पहले से सतर्क, संवेदनशील और जवाबदेह तंत्र की है।
प्रशासनिक मोर्चे पर भी तस्वीर बहुत अलग नहीं है। नगर निगम ने हाल ही में करीब साढ़े तीन हजार करोड़ रुपये का बजट पारित किया, लेकिन शहर की वास्तविक स्थिति इस भारी-भरकम बजट के दावों पर सवाल खड़े करती है। कई इलाकों में टूटी सड़कें, बदहाल सफाई व्यवस्था, जाम नालियां और जलभराव की समस्या अब भी लोगों की रोजमर्रा की परेशानी बनी हुई है।
मानसून की दस्तक से पहले नालों की सफाई का अभियान शुरू होना यह दिखाता है कि तैयारी समय से नहीं, बल्कि दबाव बढ़ने के बाद की जा रही है। इससे साफ संकेत मिलता है कि योजनाएं कागजों पर तेज हैं, लेकिन जमीन पर उनकी रफ्तार सुस्त है। इस बीच न्यायपालिका की सख्त टिप्पणी ने भी गाजियाबाद पुलिस की कार्यशैली पर बहस को और तेज कर दिया है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हालिया टिप्पणी में जमीन-जायदाद जैसे सामान्य विवादों में गैंगस्टर एक्ट लगाने और पुलिस शक्तियों के कथित दुरुपयोग पर गंभीर आपत्ति जताई है। अदालत की यह टिप्पणी केवल एक मामले की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति की ओर इशारा है जिसमें कठोर कानूनों के इस्तेमाल पर पारदर्शिता, संतुलन और जवाबदेही की जरूरत महसूस की जा रही है।
राजनीतिक स्तर पर भी हालात बहुत उत्साहजनक नहीं दिखते। विपक्ष जनता की मूल समस्याओं को लेकर व्यापक जनदबाव बनाने के बजाय कई बार प्रतीकात्मक विरोध तक सिमट जाता है, जबकि सत्ता पक्ष के कुछ नेता भी सुरक्षा, सफाई, सड़क, जलनिकासी और नागरिक सुविधाओं जैसे मुद्दों पर ठोस रोडमैप देने की बजाय बयानबाजी में अधिक सक्रिय नजर आते हैं।
दूसरी ओर वीआईपी दौरों, समीक्षा बैठकों और औपचारिक निरीक्षणों की व्यस्तता के बीच आम आदमी की छोटी-छोटी शिकायतें अक्सर सुनवाई के इंतजार में फाइलों के बीच दब जाती हैं। तेजी से फैलते शहरी ढांचे और बढ़ती आबादी वाले गाजियाबाद को केवल कार्रवाईयों की सुर्खियों, बजट घोषणाओं और औपचारिक बैठकों से नहीं संभाला जा सकता। जिले को ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था की जरूरत है जो घटना के बाद नहीं, बल्कि घटना से पहले सक्रिय हो; जो कागजों पर नहीं, जमीन पर दिखाई दे; और जो दावों से ज्यादा परिणामों के आधार पर खुद को साबित करे।
अगर गाजियाबाद को सचमुच सुरक्षित, व्यवस्थित और आधुनिक शहर बनाना है, तो अब केवल अभियान चलाने से काम नहीं चलेगा जवाबदेही तय करनी होगी, प्राथमिकताएं स्पष्ट करनी होंगी और जनता को यह भरोसा दिलाना होगा कि सिस्टम सिर्फ सुर्खियों के लिए नहीं, बल्कि उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए काम कर रहा है।


