गाजियाबाद: लोनी में हुई एक हत्या के बाद शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन उस समय और अधिक गंभीर हो गया, जब सड़क जाम में फंसी एक एंबुलेंस समय पर अस्पताल नहीं पहुंच सकी और उसमें सवार मरीज ने दम तोड़ दिया। एक ही घटना से जुड़ी दो मौतों ने न केवल कानून-व्यवस्था बल्कि विरोध प्रदर्शनों के तौर-तरीकों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मंगलवार देर रात अंकुर विहार थाना क्षेत्र की विजय विहार कॉलोनी में आफताब नामक युवक की चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी गई। सूचना मिलते ही पुलिस हरकत में आई और नामजद आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। इसके बावजूद मृतक के परिजनों और समर्थकों ने दिल्ली-देहरादून राष्ट्रीय राजमार्ग पर प्रदर्शन करते हुए लंबा जाम लगा दिया।
इसी जाम में बागपत जिले के टटीरी निवासी प्रेमपाल को अस्पताल ले जा रही एंबुलेंस भी फंस गई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार एंबुलेंस काफी देर तक जाम से बाहर नहीं निकल सकी। समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण प्रेमपाल की अस्पताल पहुंचने से पहले ही मौत हो गई। यह घटना विरोध प्रदर्शन के दौरान आपातकालीन सेवाओं के बाधित होने का गंभीर उदाहरण बन गई।
घटना के बाद लोनी विधायक नंदकिशोर गुर्जर ने गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर को पत्र लिखकर पूरे मामले में सख्त कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने कहा कि जब पुलिस मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी थी, तब राष्ट्रीय राजमार्ग जाम कर आम लोगों की जान जोखिम में डालना किसी भी स्थिति में उचित नहीं माना जा सकता।
विधायक ने अपने पत्र में यह भी दावा किया कि मृतक आफताब और उसके परिवार के कई सदस्यों के खिलाफ पहले से विभिन्न आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे परिवार के समर्थन में बड़ी संख्या में लोगों ने महिलाओं को आगे कर घंटों हाईवे बाधित रखा, जिसका सबसे दुखद परिणाम एक निर्दोष मरीज की मौत के रूप में सामने आया।
उधर, पुलिस का कहना है कि आफताब हत्याकांड में आरोपियों के खिलाफ विधिक कार्रवाई जारी है। वहीं, हाईवे जाम के दौरान हुई घटनाओं की भी अलग से जांच की जा रही है। सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल वीडियो और अन्य साक्ष्यों के आधार पर जाम में शामिल लोगों की पहचान की जा रही है और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की तैयारी चल रही है।
यह मामला अब केवल हत्या तक सीमित नहीं रह गया है। सवाल यह भी है कि यदि पुलिस आरोपियों को पकड़ चुकी थी, तो घंटों तक राष्ट्रीय राजमार्ग बाधित करने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या विरोध के नाम पर एंबुलेंस जैसी जीवनरक्षक सेवाओं को रोकना स्वीकार किया जा सकता है? और क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए प्रशासन कोई स्थायी व्यवस्था करेगा?


