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  • 20/04/2026
  • Last Update 19/04/2026 9:29 pm
  • Lucknow

महंगी फीस और किताबों की मार से बचपन पर भारी पड़ रही पढ़ाई, निजी स्कूलों की मनमानी से अभिभावक बेहाल

महंगी फीस और किताबों की मार से बचपन पर भारी पड़ रही पढ़ाई, निजी स्कूलों की मनमानी से अभिभावक बेहाल

महराजगंज: नौतनवा ब्लॉक क्षेत्र में निजी विद्यालयों की कार्यप्रणाली ने अभिभावकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। शिक्षा के नाम पर बढ़ती लागत ने अब आम परिवारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है। स्कूलों द्वारा वसूली जा रही भारी फीस, परिवहन शुल्क और महंगी किताबों के चलते अभिभावक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

अभिभावकों का कहना है कि प्राथमिक स्तर पर ही बच्चों की पढ़ाई का खर्च इतना बढ़ गया है कि उसे संभालना आसान नहीं रह गया है। औसतन हर महीने 1000 रुपये तक ट्यूशन फीस ली जा रही है, जबकि स्कूल वाहन या अन्य साधनों के नाम पर भी लगभग इतनी ही राशि अलग से वसूली जाती है। इस प्रकार एक बच्चे की शिक्षा पर न्यूनतम 2000 रुपये मासिक खर्च हो रहा है, जो निम्न और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

इसके अलावा एडमिशन फीस, रजिस्ट्रेशन, परीक्षा शुल्क, वार्षिक शुल्क और अन्य कई मदों में पूरे साल अभिभावकों से रकम ली जाती है। नए सत्र की शुरुआत में किताबों और कॉपियों के नाम पर एकमुश्त 4 से 5 हजार रुपये तक खर्च कराना आम बात हो गई है।

अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल प्रबंधन ने कुछ निर्धारित दुकानों और प्रकाशकों के साथ समझौता कर रखा है। इन्हीं स्थानों से किताबें खरीदना अनिवार्य किया जाता है, जिससे अभिभावकों के पास सस्ती किताबें खरीदने का विकल्प समाप्त हो जाता है। हर साल सिलेबस और प्रकाशक बदलने से पुरानी किताबों का उपयोग भी संभव नहीं हो पाता।

सूत्रों के मुताबिक, इस व्यवस्था में स्कूल प्रबंधन को किताबों पर 50 प्रतिशत तक का कमीशन मिलता है, जबकि अभिभावकों से पूरी कीमत वसूली जाती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि शिक्षा के नाम पर एक सुनियोजित आर्थिक तंत्र काम कर रहा है।

गौरतलब है कि जिलाधिकारी द्वारा अधिक शुल्क लेने वाले विद्यालयों को नोटिस जारी कर अतिरिक्त फीस वापस करने के निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद अब तक किसी भी विद्यालय ने इन आदेशों का पालन नहीं किया है, जिससे प्रशासनिक कार्रवाई पर भी सवाल उठने लगे हैं।

अभिभावकों ने मांग की है कि ऐसे स्कूलों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएं, अतिरिक्त वसूली वापस कराई जाए और फीस व किताबों की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए स्पष्ट नियम बनाए जाएं। उनका कहना है कि यदि समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो शिक्षा का यह बढ़ता बोझ बच्चों के भविष्य पर भी नकारात्मक असर डाल सकता है।

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